मोदी सरकार के पांच साल में सातवीं बार लगा राष्ट्रपति शासन

महाराष्ट्र में पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार राष्ट्रपति शासन तीसरी बार लागू हुआ है. जबकि, केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद अब तक सात बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है, जो कि देश के चार राज्यों में लगा है
महाराष्ट्र में राजनीतिक हालात को देखते हुए राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने राष्ट्रपति शासन लागू करने की सिफारिश की थी, जिसे स्वीकार कर लिया गया है. इस तरह से कई दिनों की उठापटक बाद आखिरकार महाराष्ट्र में राष्ट्रपति शासन लागू हो गया. महाराष्ट्र में पहली बार नहीं बल्कि तीसरी बार राष्ट्रपति शासन लागू हुआ है. जबकि, केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने के बाद अब तक सात बार राष्ट्रपति शासन लगाया जा चुका है, जो कि देश के चार राज्यों में लगा है. हालांकि आजादी के बाद से अभी तक भारत के अलग-अलग राज्यों में करीब 126 बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है.

महाराष्ट्र में पहली बार राष्ट्रपति शासन

आजादी के बाद महाराष्ट्र में पहली बार 17 फरवरी 1980 को राष्ट्रपति शासन लागू हुआ था. उस वक्त शरद पवार मुख्यमंत्री थे. ऐसे में उनके पास बहुमत था, हालांकि राजनीतिक हालात बिगड़ने पर विधानसभा भंग कर दी गई थी. ऐसे में 17 फरवरी से आठ जून 1980 तक करीब 112 दिन तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू रहा था.

महाराष्ट्र में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन

महाराष्ट्र में दूसरी बार राष्ट्रपति शासन 28 सितंबर 2014 को लगाया गया था. 2014 में चुनाव होने से ठीक पहले सत्ता में कांग्रेस थी. कांग्रेस अपने सहयोगी दल एनसीपी सहित अन्य दलों के साथ अलग हो गई थी. तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने विधानसभा भंग कर दी थी. इस तरह से कांग्रेस-एनसीपी का 15 साल पुराना गठबंधन टूट गया था. ऐसे में 28 सितंबर 2014 से लेकर 30 अक्तूबर यानी 32 दिनों तक राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू रहा.
तीसरी बार राष्ट्रपति शासन

महाराष्ट्र में तीसरी बार राष्ट्रपति शासन 12 नवंबर 2019 को लगाया गया. 24 अक्टूबर को विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को स्पष्ट बहुमत था, लेकिन सीएम पद पर दोनों के अड़ जाने के चलते सरकार नहीं बन सकी. हालांकि राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने पहले बीजेपी को सरकार बनाने का अमंत्रण दिया, लेकिन देवेंद्र फडणवीस ने अपने कदम पीछे खींच लिए.

इसके बाद गवर्नर ने शिवसेना को सरकार बनाने के लिए पूछा, लेकिन उद्धव ठाकरे भी निर्धारित समय सीमा पर बहुमत का समर्थन पत्र नहीं सौंप सके. इसके बाद एनसीपी को सरकार बनाने के लिए निमंत्रण दिया, लेकिन पार्टी ने समर्थन पत्र देने के लिए तीन दिन का वक्त मांगा. इसी का नतीजा था कि राज्यपाल ने राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश की, जिस पर कैबिनेट ने मुहर लगाई और राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मंजूरी दे दी.

नरेंद्र मोदी सरकार में लगे राष्ट्रपति शासन

बता दें कि केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार के आने से बाद महाराष्ट्र पहला राज्य नहीं है, जब किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा हो. साल 2014 के बाद से देश के चार राज्यों में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया. इसमें महाराष्ट्र, उत्तराखंड, अरुणांचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्य भी शामिल हैं.

उत्तराखंड में दो बार राष्ट्रपति शासन

मोदी सरकार के आने के बाद उत्तराखंड ने साल 2016 में दो बार राष्ट्रपति शासन लगाया गया है. पहले 25 दिन और बाद में 19 दिनों के लिए राष्ट्रपति शासन लगा. कांग्रेस में पहले फूट पड़ने के बाद राष्ट्रपति शासन लगा और दूसरी बार मई में विधायकों के दलबदल के चलते एक बार फिर राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया. कांग्रेस इस मामले को लेकर हाई कोर्ट पहुंच गई, जहां से तत्कालीन हरीश रावत सरकार को राहत मिली थी. कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के खिलाफ अपना निर्णय दिया था.

अरुणाचल प्रदेश

मोदी सरकार में ही अरुणाचल प्रदेश साल 2016 में 26 दिनों के राष्ट्रपति शासन लगा था. कांग्रेस के 21 विधायकों ने 11 बीजेपी और दो निर्दलीय विधायकों के साथ हाथ मिला लिया था. इसके चलते राज्य सरकार अल्पमत में आ गई थी, जिस के चलते राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया था. हालांकि, राष्ट्रपति शासन लगाए जाने को कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी और कोर्ट ने अपने फैसले में कांग्रेस सरकार को बहाल कर दिया था.

जम्मू-कश्मीर में दो बार राष्ट्रपति शासन

जम्मू-कश्मीर में जून 2018 में बीजेपी ने पीडीपी के नेतृत्व वाली सरकार से समर्थन वापस ले लिया था. इसके चलते महबूबा मुफ्ती ने सीएम पद से इस्तीफा दे दिया था, जिसके बाद राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया गया था. राष्ट्रपति शासन के दौरान ही राज्य में आर्टिकल 370 को रद्द कर दिया गया और राज्य से विशेष राज्य का दर्जा भी वापस ले लिया गया है. हालांकि इससे पहले भी साल 2015 में विधानसभा चुनावों में एक खंडित फैसले के बाद सरकार गठन में विफलता के चलते जम्मू-कश्मीर में केंद्रीय शासन राज्य में लागू किया गया था.

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